The officer

From PhalkeFactory

thee officer.. appears and re appears across the city, across time, anachronism, colonial residue, an intimate. a job is like a performance laid out- you put your hands into the sleeves and follow the routines, and the years pass slowly like cloth on a sewing machine.

अँग्रेज़ों के ज़माने में सिल्क स्क्रीन होते थे- या लकड़ी के- तीन पाटों का एक परदा, हर पार पर बारीक काम, जापानी फूल पाती, या सूर्यास्त के भड़कीले रंग, या शीशम पर करी गयी बारीक नक्काशी.. तो लो, मैं भी एक डेजाइन डालता हूँ, एक ऐसे पर्दे की, जो अफ़सरी ड्राइंग रूम की गहराइयों से दमके.. परदा इतना सुंदर कि पीछे कौन झाँकेगा?

परदा 1, दोपहर का आखरी पहर, पहाड़ी इलाक़ा, सांकचूरी के बाहर का पहाड़ी इलाक़ा.

लकड़ी के बल्लों के बीच तार का जाल डाला है. बल्ले और तारों के एक पाँच फीट त्रिज्या के सर्कल ने पहाड़ी की ढलान पर बिछी घास का एक हिस्सा घेर लिया है. इस कारावास के तारों पर अपने को बार बार पटक रहा है वो बारा सिंगा बालक. तारों के जाल पर उसके व्यथित बारीक बदन का लगना ही उसकी वेदना की आवाज़ है. मेरे बगल में खड़ा फोरेस्ट डिपार्टमेंट का कोई छोटे वर्ग का कर्मचारी है. उसके भूरे थके चहरे की ढलानों पर दो मैले चश्मों सी आँखें हैं, आँखों पर तैरती हैरान पुतलियाँ मेरे जैसे उस बालक को एकटक ताक रही हैं. हम दोनों शायद उस बच्चे के सर से जुड़े टहनीयों के अद्भुत जाल-मुकुट को देख कर घबरा रहे हैं, कि वो तब टूटा और अब,. उस बालक के लिए वो उसके अंग का हिस्सा हैं. वो परेशानी में अपने बदन को फिर फिर दे मारता है, हमारी कमज़ोर आँखें और सहम जाती हैं. "कल रात को जंगल से भटक कर बाहर आ गया था" वो छोटी बॅक स्टोरी देता है.

मेरी आंखँ बालक से हटकर ( और हम कर भी क्या सकते हैं? ) पहाड़ी ढलान पर से उतरते बैरे की ओर जाती है, अँग्रेज़ों के ज़माने की कुछ मैली पोशाक है, मेरी नज़र उसके हाथ के ट्रे पर है, ट्रे पर लगे फ़्लास्क और कप, फ़्लास्क याने चाय है... ट्रे मेरे पास से गुज़र कर मेरे पार जाता है, तो मैं हिरण छोड़ कर आगे बढ़ता हूँ (उसको खड़े खड़े देख ही सकता हूँ.. और देखा भी नहीं जाता).

गेस्ट हौस का गेट. पहाड़ की वही ढलान पर यहाँ घास से तिनके कंकड़ जंगली झाड़ बीन कर लॉन बनाया गया है. लॉन के एक छोर पर साहब बेंत की कुर्सी पर बैठे हैं, सामने काँच की मेज पर पड़े काग़ज़ साईन कर रहे हैं. बगल में पीठ पीछे हाथों को 'तैयार अरदली मुद्रा' में रखे अरदली, मुख पर तैयार मुस्कान, किसी नर्तक समान .. बैरा चाय साहब के सामने रखता है, मेरे अंदर बुदबुदाता ख़याल स्पष्ट हो जाता है, मैं सोचता हूँ बाहर आएगा तो मैं भी उस से चाय माँगूँगा.. छोटे कमरे में सही, पर मैं भी इस ही गेस्ट हाऊज़ में रहता हूँ! साहब के पार हरे रूमाल से लॉन के दूसरे छोर पर, पर, हरी घास में डूबी, गिरती उतरती छः खिलखिलाती बारीक टांगे, तीन युवक युवतियाँ, दाँतों में भीनी चमक , खिल खिल करते स्वर, अपनी ही फोटो ले रहे है, और उसको देख कर हँस रहे हैं, आनंदित हो रहे हैं.. ही हही ही का अचेत खुश स्वर. मैं उन्हे देख कर रुक सा जाता हूँ. एक बार, पापा के राज में, मैं ऐसा नहीं दिखता रहूँगा क्या? अरदली और अन्य मेरे रूमाल के बॉर्डर को सजाते हुए, और मैं, बीच में, बेवकूफ़ और बहुत सुंदर.